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राजनेताओं की चाल को बखूबी बयान करती किताब ”चुनावनीति””


प्रयागराज। यह किताब जहां, सियासी पार्टियों के चुनावी हथकंडों के बारे में बता रही है, वहीं भारत की लोकतांत्रिक और संघीय व्यवस्था पर पड़ रहे इसके नकारात्मक प्रभाव को भी रेखांकित करती है। पाठकों को यह समझाने की कोशिश की गई है कि पॉलिटिकल पंडितों ने चुनावों को समझने के लिए जिन थ्योरियों को सेट किया है, वे तर्कों और तथ्यों के साथ मेल नहीं खा रही हैं। सच यह है कि चुनावों को किसी सेट फॉर्मूले के आधार पर समझा नहीं जा सकता। विधानसभा हो या फिर लोकसभा, सभी तरह के चुनाव अलग-अलग परिस्थितियों पर निर्भर होते हैं। धर्मवाद, जातिवाद और क्षेत्रवाद की राजनीति भी परिस्थितियों के हिसाब से अलग-अलग समय पर काम करती है। यही वजह है कि पार्टियों को इन चुनावी हथकंडों के सहारे हर बार सफलता नहीं मिलती है। इस तरह की तमाम चीजें हैं, जिन्हें खोलने की कोशिश की गई है। उम्मीद है कि लोग इस किताब को पढ़कर किसी निष्कर्ष पर पहुंचेंगे।

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